रूट 3

हिल्डेसहाइम से आइजेनाख तक

हमारा तीसरा रूट सदियों पुराने आध्यात्मिक खजाने और कीमती विरासत से गुजरता है. इन्हें बनाने में कई सौ साल लगे.

हम लोवर सैक्सनी के शहर हिल्डेसहाइम से शुरू करते हैं. 1985 में हिल्डेसहाइम के मिशाएलिस चर्च और कैथीड्रल, दोनों को विश्व धरोहर घोषित कर दिया गया. चर्च गोल गुंबदों और ऊंची मीनारों से सजाया गया है और हिल्डेसहाइम के निवासी इसे हिमेल्सबुर्ग यानी जन्नत का किला कहते हैं. 1022 से यह किला हिल्डेसहाइम का ताज है. इसके अंदर के कमरे के लकड़ी की छत पर ईसा मसीह के वंशावली की 30 मीटर लंबी तस्वीरें बनाई गई हैं. 1061 में हिल्डेसहाइम के कैथीड्रल में कांसे की मूर्तियों को बचाकर रखा गया. कैथीड्रल के बाहर की दीवारों में 1,000 साल पुरानी गुलाब की झाड़ियां उगती हैं. इसे हिल्डेसहाइम का प्रतीक माना जाता है. इसके इर्द गिर्द बुनी गई कई कहावतें और कहानियां मशहूर हैं.

आस्था नहीं बल्कि आत्मविश्वावस के सिद्धांत पर बना आलफेल्ड का फागुस कारखाना हमारी अगली मंजिल है. जूतों के सांचे बनाने वाली फैक्ट्री को शिल्पकार वाल्टर ग्रोपिउस ने दुनिया की पहली आधुनिक शिल्प कला वाली फैक्ट्री में बदल दिया. शीशे की दीवारों और इस्पात के हल्के ढांचे वाली यह इमारत आम कारखानों से अलग दिखती है. ग्रोपिउस अपनी शैली के साथ मजदूरों के लिए अच्छा माहौल बनाना चाहते थे. इससे कारखाने के मालिक कार्ल बेनशाइट को भी फायदा हुआ. उनकी फैक्ट्री में हादसे काफी कम हो गए. बेनशाइट और ग्रोपिउस के बनाए इस नमूने को आज विश्व विरासत के तौर पर बचाया जा रहा है. 2011 में इसे विश्व धरोहर घोषित किया गया.

Weiter geht es nach Hildesheim im südlichen Niedersachsen. In der charmanten Universitätsstadt wurden 1985 gleich zwei Meisterwerke der romanischen Baukunst zum Welterbe erklärt: der Dom und die Basilika St. Michael sowie die zu ihnen gehörenden Kunstschätze. Die Basilika, ein verschachtelter Bau mit Rund- und Ecktürmen, wird von den Hildesheimern schlicht „Himmelsburg“ genannt. Sie thront seit dem Jahr 1022 über der historischen Altstadt. Einmalig in ihrem Inneren ist ein monumentales Holzdeckengemälde, das über knapp 30 Meter Länge den Stammbaum Christi zeigt. Im bereits 1061 errichteten Hildesheimer Dom werden berühmte Kunstschätze aus Bronze verwahrt. Aber auch an seinen Außenmauern wartet der Dom mit einer Besonderheit auf: Ein 1.000-jähriger Rosenstock wächst dort. Er gilt als Wahrzeichen der Stadt Hildesheim, und zahlreiche Legenden ranken sich um ihn. Fragen Sie mal einen Hildesheimer danach!

औद्योगिक काल से पहले के गोसलार को जानने के लिए पूर्व की ओर एक घंटे का सफर करना पड़ेगा. कहा जाता है कि राम्म नाम के एक शूरवीर के घोड़े ने यहां के जंगलों में अपने मालिक का इंतजार किया और बेचैन होने पर अपना खुर जोर से जमीन पर मारा. इससे जमीन के नीचे कीमती पत्थरों से भरे खदान की एक सुरंग खुल गई. रामेल्सबर्ग में आज भी पुराने खदान के सुरंगों को देखा जा सकता है. गोसलार का टाउनहॉल और कारीगर संघ का दफ्तर काइजरवोर्त इसी खदान से मिले कीमती पत्थरों से सजे हैं. 2010 में गोसलार की पुरानी जल योजना को भी विश्व धरोहर में शामिल किया गया क्योंकि पानी के बिना खनिज का खनन भी असंभव था. 13वीं शताब्दी में बने जल तंत्र में 107 तालाब 310 किलोमीटर तक फैले पानी के गड्ढे और 31 किलोमीटर नहरें हैं. ओबरहार्स की जल व्यवस्था पूर्व औद्योगिक काल की सबसे अहम ऊर्जा आपूर्ति योजनाओं में है.

ओटो वंश के लिए एक दूसरा अहम शहर था क्वेडलिनबुर्ग, जो गोसलार से केवल 60 किलोमीटर दूर है. श्लोसबर्ग पहाड़ी की ढलानों पर राजा हाइनरिष प्रथम ने सेंट सरवेशियस चर्च बनवाया. 1129 में इसका उद्घाटन किया गया. इसे होली रोमन शैली की मिसाल माना जाता है और 1994 में इसे विश्व धरोहर घोषित किया गया. बिलकुल क्वेडलिनबुर्ग की तरह, जिसकी सड़कों पर आज भी कारें नहीं चलतीं. लकड़ी के ढांचे वाले 1,300 घर इसे जर्मनी के सबसे बड़े स्मारक का खिताब दिला चुकी हैं. मध्यकालीन दृश्य और छोटी दुकानें यहां सालाना तीन लाख से ज्यादा पर्यटकों को खींचती हैं.

हमारा आखिरी पड़ाव है तीन घंटे की दूरी पर आइजेनाख. यहां आप वार्टबुर्ग की सैर भी कर सकते हैं जो 1999 से विश्व विरासत का हिस्सा है. इस ऐतिहासिक किले का नाम ईसाई धर्म के सुधारक मार्टिन लूथर से जुड़ा है. जब पोप ने मार्टिन लूथर को संप्रदाय से बेदखल कर दिया और तब के राजा ने इन्हें पनाह देने से इनकार कर दिया तो यह वार्टबुर्ग में छिपकर रहने लगे. 11 हफ्तों के अंदर मार्टिन लूथर ने बाइबल के नए टेस्टामेंट का जर्मन में अनुवाद कर दिया. मार्टिन लूथर की 1546 में मौत के बाद वार्टबुर्ग को धार्मिक स्थल घोषित कर दिया गया और आज भी यहां श्रद्धालु आते हैं.